- मिशन LiFE (पर्यावरण के लिए जीवनशैली): भारत द्वारा प्रस्तुत व्यवहारवादी अर्थशास्त्र पर आधारित प्रारूप, जो अंधाधुंध उपभोग के स्थान पर चक्रीय अर्थव्यवस्था और मांग-प्रेरित जलवायु संरक्षण को स्थापित करता है।
- संवैधानिक संरचना (अनुच्छेद 48A एवं 51A(g)): अनुच्छेद 48A राज्य पर पर्यावरण संवर्धन का दायित्व सौंपता है; अनुच्छेद 51A(g) नागरिकों के लिए वनों, झीलों और वन्यजीवों की रक्षा को मूल कर्तव्य बनाता है।
- मांग-आपूर्ति-नीति रूपांतरण मॉडल: एक त्रि-स्तरीय आर्थिक व्यवस्था, जिसमें व्यक्तिगत आदतों का बदलाव बाज़ार आपूर्ति को सुधारता है और अंततः विधायी नियमों का रूप लेता है।
कल की प्रेरक घटना: 22 अक्टूबर 2026 को पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय तथा नीति आयोग की संयुक्त समीक्षा बैठक में 2028 तक एक अरब वैश्विक नागरिकों को जोड़ने और 80 प्रतिशत स्थानीय निकायों को पर्यावरण-अनुकूल बनाने के संकल्प की पुष्टि की गई।
उपभोक्ता मांग का व्यावहारिक प्रभाव
बाज़ार सदैव उपभोक्ता प्राथमिकताओं का अनुगमन करता है।
पारंपरिक नीतियां केवल कारखानों के प्रदूषण पर नियंत्रण साधती थीं; लेकिन जब तक आम नागरिक एकल-उपयोग उत्पादों की खपत नहीं घटाते, तब तक अपशिष्ट का संकट समाप्त नहीं हो सकता। आपूर्ति पक्ष पर डंडे के जोर से नियम लागू करने की प्रशासनिक सीमाएं होती हैं।
मिशन LiFE नियंत्रण की बागडोर उपभोक्ता को सौंपता है। उदाहरण के लिए, जब फूड डिलीवरी ऐप पर ग्राहक चम्मच न लेने का विकल्प चुनते हैं, तो भोजनालय प्लास्टिक की खरीद तुरंत रोक देते हैं। यह सुधार विनियामक छापों से नहीं, बल्कि मांग के स्वतःस्फूर्त दबाव से संभव होता है।
त्रि-स्तरीय विस्तृत खाका
संस्थागत सुधार चरणबद्ध आर्थिक प्रक्रियाओं से आते हैं।
स्तर 1: नेतृत्व और संवैधानिक संरचना
नीति आयोग आकलन प्रणाली बनाता है; पर्यावरण मंत्रालय ज़मीनी क्रियान्वयन संभालता है। ग्लासगो में कॉप-26 के मंच पर घोषित और 2022 में केवड़िया से शुरू हुआ यह मिशन भारत के राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDC) का केंद्र है। यह पहल अनुच्छेद 48A के सरकारी दायित्व को अनुच्छेद 51A(g) के नागरिक कर्तव्यों से जोड़ती है।
स्तर 2: आर्थिक रूपांतरण की शृंखला
संरचनात्मक बदलाव तीन चरणों में आगे बढ़ता है:
- 1. मांग में परिवर्तन
- व्यक्तिगत निर्णय पर्यावरण-अनुकूल विकल्पों की व्यापक बाज़ार मांग उत्पन्न करते हैं।
- 2. आपूर्ति में परिवर्तन
- उपभोक्ता रुझान देखकर उद्योग अपनी उत्पादन शृंखलाओं को पुनर्चक्रण योग्य सामग्री की ओर मोड़ते हैं।
- 3. नीतिगत औपचारिकता
- नियामक संस्थाएं बदले हुए बाज़ार को देखकर हरित खरीद नियम और विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व (EPR) के वैधानिक नियम लागू करती हैं।
स्तर 3: स्थानीय स्तर पर ठोस क्रियान्वयन
मिशन ने सात प्राथमिक क्षेत्रों में 75 विशिष्ट और मापने योग्य कार्य निर्धारित किए हैं। इनमें जल संरक्षण, ऊर्जा बचत, प्लास्टिक त्याग, संधारणीय कृषि उत्पाद, स्रोत पर कचरा पृथक्करण, ई-कचरा प्रबंधन और निम्न-कार्बन जीवनशैली शामिल हैं।
प्रशासनिक स्तर पर वर्ष 2028 तक देश की 80 प्रतिशत ग्राम पंचायतों और शहरी निकायों में चक्रीयता ऑडिट पूरा करने का लक्ष्य है, जिससे अपशिष्ट पृथक्करण और भूजल पुनर्भरण स्थानीय शासन का नियमित हिस्सा बन सकें।
त्वरित तथ्य सारणी
| आयाम | निर्धारित मानक |
|---|---|
| नोडल संस्थाएं | पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय और नीति आयोग |
| परिचालन दायरा | 1 अरब नागरिक; 7 प्राथमिक क्षेत्रों में 75 विशिष्ट कार्य बिंदु |
| संस्थागत समय-सीमा | 2028 तक 80% ग्राम पंचायतें और नगर निकाय प्रमाणित |
| संवैधानिक आधार | भारतीय संविधान के अनुच्छेद 48A तथा अनुच्छेद 51A(g) |
