Macroeconomic Basics 📅 23 October 2026 ✍️ Dr. Arvind Swaminathan

वैश्विक उथल-पुथल के बीच भारत की दोहरी आर्थिक ढाल

समष्टि अर्थशास्त्र के मूल तत्व: वैश्विक अस्थिरता के बीच भारत की दोहरी आर्थिक ढाल

कल का घटनाक्रम: 22 अक्टूबर 2026 को केंद्रीय वित्त मंत्रालय ने मध्यावधि समष्टि आर्थिक समीक्षा पूरी की। इस समीक्षा के अनुसार भारत ने विदेशी ऊर्जा झटकों से विकास दर को बचाने के लिए ₹1.97 लाख करोड़ के औद्योगिक प्रोत्साहन और रणनीतिक कच्चे तेल भंडारों का प्रभावी उपयोग किया है।

भू-राजनीतिक तनाव के बीच विशाल विकासशील अर्थव्यवस्था संभालना जटिल है। सरकारी पूंजीगत व्यय आर्थिक गति बढ़ाता है; केंद्रीय बैंक का मौद्रिक ढांचा कीमतों को थामता है। वर्ष 2026 के उत्तरार्ध में भारत ने 14 प्रमुख क्षेत्रों में विनिर्माण क्षमता बढ़ाई, बेरोजगारी दर 3.2% पर रखी और व्यापार घाटे को GDP के 2.0% के भीतर सीमित रखा।

तालिका 1: प्रमुख समष्टिगत आर्थिक संकेतक
प्रमुख आयामप्रामाणिक विवरण / सांख्यिकी
नियामक एवं प्रशासनिक संस्थाएंवित्त मंत्रालय और भारतीय रिजर्व बैंक (RBI)
औद्योगिक नीति आवंटन14 प्राथमिक क्षेत्रों में ₹1.97 लाख करोड़ (PLI)
वैधानिक मुद्रास्फीति लक्ष्य4% (±2% सहनीय दायरा), RBI अधिनियम, 1934
बाह्य घाटा सुरक्षा सीमाचालू खाता घाटा (CAD) ≤ 2.0% (GDP का अनुपात)
श्रम बाजार सांख्यिकीहेडलाइन बेरोजगारी 3.2% (PLFS, NSO रिपोर्ट)
कानूनी व संवैधानिक ढांचाFRBM अधिनियम, 2003 एवं संविधान का अनुच्छेद 112

वैधानिक समष्टिगत संतुलन

वित्तीय अनुशासन नीतियों के स्पष्ट बंटवारे पर टिकता है। भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 के तहत मौद्रिक नीति समिति रेपो दर के जरिए मूल्य स्थिरता बनाती है। आयातित जिंसों की कीमतें बढ़ते ही नकदी प्रवाह कम किया जाता है। इसके विपरीत, वित्त मंत्रालय FRBM अधिनियम के नियमों में बंधकर काम करता है। अनुच्छेद 112 के तहत उपभोग सब्सिडी घटाकर राजमार्गों और माल ढुलाई गलियारों में पूंजी लगाई जाती है। व्यावहारिक रूप से यह व्यवस्था माल ढुलाई की लागत घटाती है, जिसके बाद निजी क्षेत्र अपने संयंत्र लगाने के लिए पूंजी जुटाता है।

आपूर्ति-पक्ष का औद्योगिक आधार

उपभोग सब्सिडी की अपनी सीमाएं होती हैं। भारत ने उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन (PLI) के जरिए आपूर्ति क्षमता बढ़ाने का मार्ग चुना है। सेमीकंडक्टर, औषधि और हरित ऊर्जा जैसे 14 क्षेत्रों के लिए ₹1.97 लाख करोड़ सुरक्षित किए गए हैं। बिना जांचे कोई वित्तीय मदद जारी नहीं होती। फैक्ट्रियों द्वारा संवर्धित उत्पादन सिद्ध करने पर ही सरकारी प्रोत्साहन मिलता है। इस व्यवस्था से विदेशी पुर्जों पर निर्भरता घटती है।

बाह्य सुरक्षा और रोजगार की स्थिति

भुगतान संतुलन बिगड़ने से घरेलू मुद्रा पर दबाव बनता है। भारत का तेल आयात बिल बड़ा होने के कारण वैश्विक तनाव चालू खाता घाटे को 2.0% से ऊपर ले जाने का जोखिम पैदा करते हैं। इसके समाधान हेतु भूमिगत रणनीतिक तेल भंडार तैयार किए गए हैं। दूसरी ओर, राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय के आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण के अनुसार बेरोजगारी दर 3.2% दर्ज की गई है। कृषि और लघु उपक्रम श्रम शक्ति को खपाए हुए हैं। ये पारंपरिक क्षेत्र झटकों को सहन करते हैं, जबकि आधुनिक विनिर्माण इकाइयां धीरे-धीरे अपनी क्षमता बढ़ा रही हैं।


आर्थिक स्थिरता सतत नीतिगत अनुशासन से ही संभव है। मुद्रास्फीति नियंत्रण, पूंजीगत निवेश और उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन से घरेलू अर्थव्यवस्था बाह्य वित्तीय झटकों से सुरक्षित बनी हुई है।

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Q1 भारत में व्यापक आर्थिक शासन और सांविधिक रूपरेखा के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. लचीली मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण (FIT) अधिदेश के तहत भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 के अंतर्गत भारतीय रिजर्व बैंक को उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) मुद्रास्फीति को 4% पर एक सांविधिक सहिष्णुता बैंड के साथ लक्षित करना आवश्यक है। 2. भुगतान संतुलन की अस्थिरता को रोकने के लिए चालू खाता घाटा (CAD) के विवेकपूर्ण सीमा को सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के 5.0% के भीतर सख्ती से बनाए रखा जाता है। 3. उत्पादन लिंक्ड प्रोत्साहन (PLI) योजना बेसलाइन क्षमता के बजाय अंकेक्षित (audited), वृद्धिशील कारखाने के उत्पादन के आधार पर ही लक्षित औद्योगिक सब्सिडी वितरित करती है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

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