भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था: स्वायत्त संस्थानों और नियामक ढांचे में सुधार
कल क्या हुआ
केंद्र सरकार ने को सभी राष्ट्रीय संगठनों और स्वायत्त सार्वजनिक संस्थानों के लिए नए प्रशासनिक नियम अधिसूचित किए। इसके तहत कामकाज के डिजिटल मानक अनिवार्य कर दिए गए हैं।
फाइलों की लेटलतीफी पर अंकुश
पहले व्यवस्था बेहद पेचीदा थी। किसी भी मंजूरी के लिए आम नागरिक या उद्यमी को 40 दफ्तरों की खाक छाननी पड़ती थी; फाइलें 180 कार्यदिवसों तक दबी रहती थीं। कल जारी आदेश ने इस लालफीताशाही पर पूर्ण विराम लगा दिया। अब सभी सार्वजनिक मंजूरियों के लिए 30 दिनों की सख्त विधिक सीमा तय है।
प्रशासन को रिले रेस की तरह समझिए। पहले हर नियामक अपनी अलग पगडंडी पर मनमाने नियमों के सहारे दौड़ रहा था। नए प्रावधानों ने सभी सांविधिक खिलाड़ियों को एक ही ट्रैक पर खड़ा कर दिया है। प्रक्रिया की गति अब पारदर्शी है। जवाबदेही से कोई बच नहीं सकता।
नियामक बदलाव: तुलनात्मक दृष्टि
इस अधिसूचना के जरिए जमीनी स्तर पर चार बड़े बदलाव किए गए हैं:
| मापदंड | पुरानी व्यवस्था | नया मानक | व्यावहारिक प्रभाव |
|---|---|---|---|
| मंजूरी की समयसीमा | अलग-अलग विभागों में 120 से 180 कार्यदिवस। | डिजिटल पोर्टल द्वारा अधिकतम 30 कैलेंडर दिवस। | प्रशासनिक देरी में 75% की कमी; समय सीमा समाप्त होते ही स्वतः अनुमति। |
| वित्तीय ऑडिट और रिपोर्ट | कागजी वार्षिक रिपोर्ट, जो साल भर की देरी से आती थीं। | अनिवार्य डिजिटल त्रैमासिक वित्तीय प्रकटीकरण। | सरकारी खर्चों पर वास्तविक समय में नागरिक निगरानी। |
| कागजी औपचारिकताओं का भार | चार से पांच अलग-अलग नियामकों को एक जैसे दस्तावेज देना। | केंद्रीय संस्थागत गेटवे के माध्यम से एकल डेटा प्रविष्टि। | दस्तावेजी बोझ में 50% की प्रत्यक्ष कटौती। |
| शिकायत निवारण | नागरिक चार्टर के तहत 45 दिनों का गैर-बाध्यकारी लक्ष्य। | सख्त निगरानी के साथ 14 दिनों की बाध्यकारी सीमा। | औपचारिक पावती के स्थान पर निश्चित समाधान। |
हितधारकों पर सीधा असर
- प्रतियोगी छात्र: प्रशासनिक परीक्षाओं की तैयारी करने वालों के लिए सांविधिक और गैर-सांविधिक निकायों का अंतर समझना अब और प्रासंगिक हो गया है; संघ लोक सेवा आयोग के पाठ्यक्रम में यह सीधा बदलाव है।
- केंद्रीय नियामक: सौ से अधिक स्वायत्त निकायों के कार्यक्षेत्र स्पष्ट किए गए हैं। अंतर-विभागीय विवाद घटेंगे; वित्तीय प्रकटीकरण समान नियमों से होगा।
- नागरिक और उद्योग जगत: जमीनी स्तर पर, आम नागरिकों और सूचना का अधिकार कार्यकर्ताओं को 14 दिन में समाधान पाने का कानूनी अधिकार मिल गया है।
आगे की राह
प्रशासनिक सुधार केवल नियमों से नहीं आते। नए ढांचे में देरी करने वाले अधिकारियों की जवाबदेही तय की गई है। ऐतिहासिक रूप से, विभाग सुधारों को दबाने का प्रयास करते रहे हैं; वस्तुतः इस बार सॉफ्टवेयर आधारित ट्रैकिंग उस सुस्ती को खारिज करती है। भारतीय प्रशासनिक मशीनरी अब व्यक्तिगत इच्छा से नहीं, संहिताबद्ध विधिक तंत्र से संचालित होगी।