मुख्य परीक्षा बिंदु एवं महत्वपूर्ण संकल्पनाएं
- दीर्घायु जोखिम (Longevity Risk): जीवन प्रत्याशा में वृद्धि और निरंतर मुद्रास्फीति के कारण व्यक्ति के अपनी संचित पूंजी की तुलना में अधिक समय तक जीवित रहने का वित्तीय संकट।
- इरडा अधिनियम, 1999: भारतीय बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण की स्थापना करने वाला वैधानिक ढांचा, जो बीमा और वार्षिकी (Annuity) क्षेत्र के व्यवस्थित संवर्धन एवं नियमन को नियंत्रित करता है।
- पीएफआरडीए अधिनियम, 2013: राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली (NPS) सहित देश के संगठित पेंशन ढांचे की देखरेख करने वाला विधायी आधार।
- इंडिया रिटायरमेंट इंडेक्स स्टडी (IRIS): शहरी भारत में सेवानिवृत्ति की समग्र तैयारी का वित्तीय अनुशासन, स्वास्थ्य तैयारी और सामाजिक स्थिरता के पैमानों पर मूल्यांकन करने वाला सूचकांक।
घटनाक्रम: को एक्सिस मैक्स लाइफ इंश्योरेंस द्वारा जारी 'भरोसा टॉक्स इंडिया रिटायरमेंट इंडेक्स स्टडी' (IRIS 6.0) के अनुसार, 71% शहरी महिलाएं सेवानिवृत्ति हेतु नियमित निवेश करती हैं, किंतु इनमें से मात्र 30% को भरोसा है कि उनकी पूंजी सेवानिवृत्ति के 10 वर्ष बाद भी शेष रहेगी।
पृष्ठभूमि: पारिवारिक सुरक्षा का क्षरण
पुराना सामाजिक अनुबंध सरल था। संयुक्त परिवारों में कई पीढ़ियां एक साथ रहती थीं; संतानों को बुजुर्गों की स्वाभाविक पेंशन समझा जाता था। वृद्धजनों की चिकित्सा और दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति परिवार की साझी पूंजी से होती थी। अलग से सेवानिवृत्ति कोष तैयार करने की परंपरा नहीं थी। बचत का स्वरूप अचल संपत्ति या आभूषणों तक सीमित था।
शहरीकरण ने इस संरचना को बदल दिया। एकल परिवारों के उदय और बढ़ती चिकित्सीय लागत ने इस अनौपचारिक व्यवस्था को समाप्त कर दिया है। शहरी जीवन प्रत्याशा अब 75 वर्ष से अधिक हो चुकी है; प्रत्येक व्यक्ति को सेवानिवृत्ति के पश्चात 20 से 30 वर्ष बिना मासिक आय के बिताने पड़ते हैं। मुद्रास्फीति नियमित बचत को तेजी से समाप्त करती है। वित्तीय स्वतंत्रता अब अनिवार्य आवश्यकता है। नियमित बचत करना एक कदम है; उस बचत को जीवन के अंत तक बनाए रखना दूसरी चुनौती है।
संस्थागत विकास: नियामक व्यवस्था का सफर
- — बीमा बाजार का उदारीकरण
- संसद ने इरडा अधिनियम, 1999 पारित कर बीमा क्षेत्र को निजी कंपनियों के लिए खोला। इस कानून ने पॉलिसीधारकों के वित्तीय हितों की रक्षा और आजीवन वार्षिकी अनुबंधों के लिए कड़े मानक स्थापित किए।
- — अंशदायी पेंशन प्रणाली की स्थापना
- पीएफआरडीए अधिनियम, 2013 के माध्यम से भारत में अनफंडेड 'निश्चित लाभ' मॉडल को समाप्त कर बाजार-आधारित 'निश्चित अंशदान' संरचना को कानूनी रूप दिया गया।
- — IRIS 6.0 का स्पष्ट संकेत
- नवीनतम अध्ययन ने 41 प्रतिशत अंकों के गंभीर अंतर को रेखांकित किया: 71% शहरी महिलाएं निवेश तो कर रही हैं, पर उनमें से 70% महिलाएं 10 वर्षों के भीतर अपनी जमा-पूंजी समाप्त होने के जोखिम से घिरी हैं।
संकल्पनाएं: दीर्घायु जोखिम और वार्षिकी
1. दीर्घायु जोखिम (The Longevity Trap): मान लीजिए कोई पर्वतारोही 10 किलोमीटर की यात्रा का राशन लेकर निकलता है, किंतु वास्तविक रास्ता 25 किलोमीटर लंबा निकलता है और बीच में कोई जलस्रोत उपलब्ध नहीं है। दीर्घायु जोखिम ठीक यही वित्तीय संकट है। यदि कोई नागरिक 60 वर्ष की आयु में 10 वर्ष के खर्च जितनी पूंजी लेकर कार्यमुक्त होता है और 82 वर्ष तक जीवित रहता है, तो जीवन के अंतिम 12 वर्ष उसके लिए अत्यधिक असुरक्षित हो जाते हैं।
2. वार्षिकी (The Regulated Tap): एकमुश्त राशि को बैंक खाते में रखकर खर्च करने के बजाय वार्षिकी उसे एक नियंत्रित जल-प्रवाह में बदल देती है। निवेशक अपनी संचित पूंजी विनियमित जीवन बीमा कंपनी को सौंपता है। इसके बदले कंपनी अनुबंध करती है कि वह निवेशक को जीवनपर्यंत हर महीने एक निश्चित राशि का भुगतान करेगी, चाहे वह कितने भी वर्ष जीवित रहे।
| मानक | इरडा (IRDAI) ढांचा | पीएफआरडीए (PFRDA) ढांचा |
|---|---|---|
| प्राथमिक विधान | इरडा अधिनियम, 1999 | पीएफआरडीए अधिनियम, 2013 |
| मूल दायित्व | बीमाकर्ताओं का नियमन और आजीवन वार्षिकी अनुबंधों की सुरक्षा | पेंशन फंड प्रबंधन, केंद्रीय रिकॉर्डकीपिंग और एनपीएस का विस्तार |
| मुद्रास्फीति संतुलन | स्थिर नाममात्र आय; क्रय-शक्ति के क्षरण का जोखिम | इक्विटी और सरकारी प्रतिभूतियों में बाजार-आधारित विविधीकरण |
भविष्य की राह
केवल बचत करना पर्याप्त नहीं है। IRIS 6.0 के निष्कर्ष स्पष्ट करते हैं कि उच्च भागीदारी का अर्थ वित्तीय स्वावलंबन नहीं होता। व्यावहारिक स्तर पर, शहरी भारतीय अपनी पूंजी को कम ब्याज वाले सावधि जमा और ऋण-साधनों में बांधकर रखते हैं, जहां वास्तविक प्रतिफल नकारात्मक रहता है।
सुधार की प्रक्रिया को बुनियादी बचत से आगे बढ़ना होगा। निवेशकों को संतुलित इक्विटी-ऋण आबंटन, दीर्घकालिक वार्षिकी और स्वास्थ्य-इंडेक्स आधारित योजनाओं को अपनाना होगा। नियामकों के समक्ष प्राथमिक चुनौती यही है कि जीवन के वर्ष बढ़ने के साथ नागरिकों का वित्तीय आधार समय से पहले समाप्त न हो।