🎯 Question #93World Geography 📅 16 October 2026

वैश्विक भू-उपयोग पैटर्न और कृषि भूगोल के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. पृथ्वी की कुल स्थलीय भूमि का लगभग 38% हिस्सा वर्तमान में कृषि उद्देश्यों के लिए खेती और प्रबंधित किया जाता है। 2. कुल वैश्विक कृषि भूमि पदचिह्न के भीतर, स्थायी घास के मैदान और चरगाह लगभग दो-तिहाई हिस्से पर कब्जा करते हैं, जबकि कृषि योग्य फसल भूमि लगभग एक-तिहाई हिस्सा बनाती है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

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This question was curated from today's in-depth analytical breakdown: भूख का भूगोल: वैश्विक भूमि उपयोग और वितरण प्रणाली

कल की प्रेरक घटना

16 अक्टूबर 2026 को संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन ने विश्व खाद्य दिवस का आयोजन किया। इस मंच पर वैश्विक भूगोल का एक आधारभूत संकट सामने आया: पृथ्वी की 38% स्थलीय भूमि पर खेती होने के बाद भी परिवहन और वितरण की विफलता से 73 करोड़ लोग गंभीर भुखमरी झेल रहे हैं।

परिदृश्य: एक नज़र में

पूरी पृथ्वी को सौ एकड़ की एक कृषि जोत मानिए। मानव समाज इसके अड़तीस एकड़ हिस्से पर अनाज और पशु उत्पाद उगाता है। इसके बावजूद, आबादी का दसवां हिस्सा खाली पेट सोने पर बाध्य है। 16 अक्टूबर 1945 को स्थापित खाद्य एवं कृषि संगठन के 81 वर्ष पूरे होने पर वैश्विक विमर्श इसी विसंगति पर केंद्रित रहा। उत्पादन के केंद्र उपभोक्ता बस्तियों से कटे हुए हैं। इस भौगोलिक विषमता के विरुद्ध भारत का सार्वजनिक वितरण तंत्र एक ठोस संस्थागत समाधान प्रस्तुत करता है।

महत्वपूर्ण सांख्यिकी मैट्रिक्स

प्रमुख आयामप्रमाणित विवरण / मानक आंकड़े
नियामक संस्थाएंखाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) / उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्रालय
वैश्विक भूमि उपयोगकुल स्थलीय भूमि का 38% (एक-तिहाई कृष्य फसल भूमि; दो-तिहाई घास के मैदान व चारागाह)
राष्ट्रीय खाद्यान्न उत्पादनखरीफ, रबी और जायद चक्रों से कुल 33.2 करोड़ मीट्रिक टन से अधिक
वितरण का पैमानाNFSA, 2013 और PMGKAY के अधीन 81.35 करोड़ लक्षित नागरिक
सांविधिक आवंटनप्रति व्यक्ति प्रति माह 5 किलोग्राम निःशुल्क खाद्यान्न

विषय के 3 मुख्य स्तंभ

1. वैश्विक भूमि-उपयोग भूगोल और स्थानिक असंतुलन
कृषि भूगोल के अनुसार पृथ्वी का 38% बर्फ-मुक्त धरातल कृषि कार्यों में संलग्न है। इस भूमि का आंतरिक विभाजन असमान है: दो-तिहाई भूभाग केवल मवेशी चराने के काम आता है; केवल एक-तिहाई भाग पर सीधे खाए जाने वाले अनाज की खेती होती है। सिंधु-गंगा के मैदान और अमेरिकी प्रेयरी क्षेत्र अनाज के विपुल भंडार पैदा करते हैं। इसके विपरीत, आयात शुल्क, युद्ध और लॉजिस्टिक रुकावटें इस आपूर्ति को अवरुद्ध कर देती हैं। उत्पादन का यह आधिक्य भूखे समाज तक समय पर नहीं पहुंच पाता।
2. भारत की कृषि-जलवायु संरचना और त्रि-मौसमी सुरक्षा
भारत ने प्राकृतिक जोखिमों का प्रबंधन अपने पारिस्थितिकीय विभाजन से किया है। देश 15 विशिष्ट कृषि-जलवायु क्षेत्रों में बंटा हुआ है। यह क्षेत्रीयकरण तापमान, वर्षा और मिट्टी की संरचना पर आधारित है। किसान तीन ऋतुओं में फसलें उगाते हैं: खरीफ फसलें मानसूनी वर्षा पर निर्भर हैं; रबी फसलें शीतकालीन आर्द्रता में पकती हैं; जायद फसलें ग्रीष्म ऋतु की अल्पावधि में उगाई जाती हैं। इस व्यवस्था से भारत प्रतिवर्ष 33.2 करोड़ मीट्रिक टन से अधिक खाद्यान्न संचित करता है। एक क्षेत्र का सूखा पूरे देश का अन्न भंडार खाली नहीं कर पाता।
3. सांविधिक सार्वजनिक वितरण सुरक्षा तंत्र
अनाज उपजाना कृषि भूगोल की परिधि में आता है; उसे जरूरतमंदों की थाली तक पहुंचाना प्रशासनिक दायित्व है। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013 के माध्यम से संविधान के अनुच्छेद 21 और अनुच्छेद 47 को विधिक रूप दिया गया। प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना के तहत 81.35 करोड़ लाभार्थियों को प्रति माह 5 किलो अनाज निःशुल्क दिया जा रहा है। भारतीय खाद्य निगम के गोदामों से राशन की दुकानों तक फैली यह श्रृंखला कठिन भौगोलिक अवरोधों को लांघकर दूरस्थ बस्तियों तक खाद्यान्न पहुंचाती है।

सार-संक्षेप

खाद्य सुरक्षा केवल उत्पादन की मात्रा पर निर्भर नहीं करती। यह अनिवार्य रूप से स्थानिक भूगोल और कुशल परिवहन का संतुलन है। दुनिया 38% भूमि जोतकर भी 73 करोड़ लोगों को भुखमरी के हवाले छोड़ देती है। भारत ने 15 कृषि-जलवायु क्षेत्रों के उत्पादन को 81.35 करोड़ लोगों के सांविधिक अधिकार से जोड़कर समाधान का व्यावहारिक मार्ग दिखाया है। आगे का रास्ता स्पष्ट है: विश्व को केवल उपज बढ़ाने के बजाय पारदर्शी और विधिक आपूर्ति श्रृंखलाओं के निर्माण पर ध्यान देना होगा।

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