मूल अधिकार बनाम नीति-निदेशक तत्व: समान नागरिक संहिता की कसौटी
राज्य की नीतिगत आकांक्षाओं और नागरिक स्वायत्तता के बीच संतुलन ही संविधान का वास्तविक आधार है।
कल की घटना का संदर्भ
16 अक्टूबर 2026 को समान नागरिक संहिता के क्रियान्वयन को लेकर राष्ट्रीय विमर्श में एक नया मोड़ आया: क्या अनुच्छेद 44 के तहत प्रस्तावित संहिता 28 राज्यों और 8 केंद्र शासित प्रदेशों में विवाह और उत्तराधिकार के व्यक्तिगत कानूनों को सुधारते हुए समलैंगिक व ट्रांसजेंडर नागरिकों के भाग III में निहित अधिकारों की रक्षा कर पाएगी?
संवैधानिक संतुलन: एक विहंगम दृष्टि
अधिकारों का संतुलन जटिल है। भारतीय संविधान की कार्यप्रणाली को रेल प्रणाली के रूप में समझा जा सकता है। भाग III के मूल अधिकार नागरिकों पर सत्ता के मनमाने दबाव को रोकने वाले सुरक्षा ब्रेक हैं; भाग IV के नीति-निदेशक तत्व सामाजिक समता की दिशा तय करने वाले चालक बल हैं। दोनों की गति में समन्वय अनिवार्य है। 25 भागों और 12 अनुसूचियों वाले विशाल तंत्र में 1.4 अरब नागरिकों के उत्तराधिकार, विवाह और संरक्षण के नियम बदलना बेहद संवेदनशील कार्य है।
महत्वपूर्ण तथ्य सारणी
| प्रमुख आयाम | प्रमाणित विवरण / सांख्यिकी |
|---|---|
| नियामक संस्थाएं | विधि एवं न्याय मंत्रालय; भारत का सर्वोच्च न्यायालय |
| संवैधानिक दायरा | 25 भाग, 12 अनुसूचियां और 395 मूल अनुच्छेद (1.4 अरब से अधिक नागरिक) |
| भौगोलिक विस्तार | 28 राज्य और 8 केंद्र शासित प्रदेश |
| संवैधानिक टकराव बिंदु | अनुच्छेद 44 (भाग IV) बनाम अनुच्छेद 14, 15 एवं 21 (भाग III) |
| प्रभावित वर्ग | धार्मिक अल्पसंख्यक, लैंगिक विविधता वाले समुदाय और ट्रांसजेंडर व्यक्ति |
यूसीसी और मूल अधिकारों के अंतर्संबंध: तीन मुख्य पक्ष
1. वादयोग्यता बनाम राज्य का नीतिगत लक्ष्य (भाग III बनाम भाग IV)
प्रवर्तनीयता ही दोनों भागों को अलग करती है। मूल अधिकार सीधे न्यायालय में चुनौती योग्य हैं। किसी भी नागरिक की स्वतंत्रता छिनने पर अनुच्छेद 32 के तहत तुरंत याचिका दायर की जा सकती है। इसके विपरीत, अनुच्छेद 44 केवल नीतिगत निर्देश देता है। व्यवहार में, संसद जब भी इस निर्देश को कानून का रूप देगी, वह साधारण कानून बन जाएगा। तब उस कानून को अनुच्छेद 14 और 21 की कसौटी पर अपनी वैधता साबित करनी होगी।
2. समलैंगिक और ट्रांसजेंडर नागरिकों के लिए समावेशिता
एकरूपता का आशय बहुसंख्यक दृष्टिकोण थोपना नहीं है। पुराने पुरुष-महिला आधारित कानूनी ढांचों को जस का तस सभी समुदायों पर लागू करना समानता नहीं कहलाता। विशेष रूप से, अनुच्छेद 21 के तहत मान्यता प्राप्त लैंगिक पहचान, निजता और गरिमा को विवाह तथा उत्तराधिकार के नए नियमों में जगह मिलनी चाहिए। यांत्रिक एकरूपता के स्थान पर सारभूत समता स्थापित करना ही संविधानसम्मत मार्ग है।
3. संवैधानिक संतुलन और न्यायिक नजीर (अनुच्छेद 31C की पृष्ठभूमि)
राज्य की विधायी सीमाओं का इतिहास पुराना है। ऐतिहासिक रूप से 25वें संशोधन द्वारा अनुच्छेद 31C जोड़कर निदेशक तत्वों को मूल अधिकारों पर तरजीह देने की कोशिश की गई थी। सर्वोच्च न्यायालय ने मिनर्वा मिल्स मामले में साफ किया कि भाग III और भाग IV एक ही रथ के दो पहिए हैं। किसी एक को दूसरे पर निरपेक्ष प्राथमिकता देने से संवैधानिक संतुलन पूरी तरह नष्ट हो जाता है।