🎯 Question #118Indian Geography 📅 18 October 2026

लद्दाख की भौतिक भूगोल और जलवायु के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. यह महान हिमालय के वृष्टिछाया (rain-shadow) क्षेत्र की लीवर्ड दिशा में स्थित है, जिससे एक उच्च-तुंगता वाला ट्रांस-हिमालयी ठंडा रेगिस्तान बनता है जहाँ वार्षिक वर्षा आमतौर पर 100 मिलीमीटर से कम होती है। 2. यह क्षेत्र एक महत्वपूर्ण जलवैज्ञानिक इंजन का निर्माण करता है जहाँ हिमनद का पिघलाव ऊपरी सिंधु नदी प्रणाली को पोषित करता है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

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This question was curated from today's in-depth analytical breakdown: लद्दाख का भूगोल: सामरिक सीमाएं, नदियां और स्वायत्तता

उत्तरी सीमा का भूगोल: लद्दाख में संप्रभुता, जलतंत्र और स्वायत्तता

प्रमुख परीक्षा उपयोगी बिंदु एवं संकल्पनाएं

  • ट्रांस-हिमालयी वृष्टि-छाया क्षेत्र: महान हिमालय की लीवर्ड (पवनविमुख) दिशा में स्थित उच्च-तुंगता वाला शुष्क भू-आकृतिक क्षेत्र। मानसूनी पवनों के अवरोध के चलते 3,000 मीटर से अधिक ऊंचाई पर यह शीत मरुस्थल अस्तित्व में आता है।
  • छठी अनुसूची और अनुच्छेद 244: संविधान प्रदत्त विशेष सुरक्षा तंत्र, जिसके तहत गठित स्वायत्त जिला परिषदें (एडीसी) जनजातीय क्षेत्रों में भूमि, पारंपरिक रीति-रिवाजों और पर्वतीय पर्यावरण का नियमन करती हैं।
  • वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी): भारतीय लद्दाख को चीनी नियंत्रण वाले भूभाग से अलग करने वाली 826 किलोमीटर लंबी वास्तविक सैन्य सीमारेखा, जो सामरिक दर्रों, नदी घाटियों और बीहड़ पठारों से गुजरती है।

कल का घटनाक्रम

18 अक्टूबर 2026 को 'एपेक्स बॉडी लेह' के नेतृत्व में लद्दाख के संयुक्त नागरिक समूहों ने 59,146 वर्ग किलोमीटर में फैले पूरे केंद्र शासित प्रदेश पर भारत की संप्रभुता को दोहराते हुए 826 किलोमीटर लंबी वास्तविक नियंत्रण रेखा पर चीनी दावों को खारिज किया।

सामरिक भूगोल: उपमहाद्वीप का रक्षा प्राचीर

भूगोल ही रक्षा की पहली शर्त है। उत्तर में कराकोरम पर्वतमाला और दक्षिण में महान हिमालय के बीच फैला यह 59,146 वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र देश का सबसे ऊंचा सुरक्षा प्राचीर है। ऊंचे कगारों पर नियंत्रण रखने वाला राष्ट्र ही नीचे की घाटियों को सुरक्षित रख पाता है। संसद द्वारा पारित जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019 के अंतर्गत 31 अक्टूबर 2019 को लद्दाख एक पृथक केंद्र शासित प्रदेश बना। वहीं, 1962 के युद्ध के बाद से चीनी कब्जे वाले 38,000 वर्ग किलोमीटर के अक्साई चिन क्षेत्र पर भारत का कानूनी और संप्रभु दावा पूरी तरह अटूट है।

ऊंचाई यहां की जीवनरेखा तय करती है। 3,000 मीटर से अधिक की ऊंचाई पर वार्षिक वर्षा 100 मिलीमीटर से भी कम दर्ज होती है। शुष्क परिस्थितियों के बावजूद यह पठार उत्तरी भारत का सबसे बड़ा जल स्रोत है। हिमनदों का पिघलाव ऊपरी सिंधु तंत्र की जीवनदायिनी नदियों को जल उपलब्ध कराता है। इस क्षेत्र के प्रमुख दर्रे और जलमार्ग सामरिक रसद के लिए अनिवार्य हैं:

लद्दाख के प्रमुख सामरिक दर्रे और अपवाह तंत्र
भौगोलिक संरचनाऊंचाई / विस्तारसामरिक एवं जल-वैज्ञानिक महत्व
खारदुंग ला5,359 मीटरलेह घाटी को सामरिक नुब्रा और श्योक घाटियों से जोड़ता है।
चांग ला5,360 मीटरपेंगोंग त्सो और पूर्वी सीमांत सेक्टर का मुख्य संपर्क मार्ग।
श्योक नदीजलग्रहण ~33,000 वर्ग किमीरिमू हिमनद से निकलकर कराकोरम के समानांतर बहती है।
जांस्कर नदीजलग्रहण ~16,000 वर्ग किमीगहरी कंदराओं से बहती हुई निम्मू के निकट सिंधु में मिलती है।

"लद्दाख की क्षेत्रीय अखंडता को उसकी जनसांख्यिकी और पर्यावरण से अलग करके नहीं देखा जा सकता। हमारी 826 किलोमीटर लंबी सीमा की रक्षा का सीधा अर्थ यहां के ऊंचे ग्लेशियरों, चरागाहों और मूल निवासियों के अधिकारों की सुरक्षा है।"

— संयुक्त वक्तव्य, नागरिक नेतृत्व (एपेक्स बॉडी लेह)

संवैधानिक प्रावधान और स्थानीय पारिस्थितिकी

सीमांत क्षेत्रों की रक्षा में स्थानीय आबादी मुख्य भूमिका निभाती है। लद्दाख की कुल आबादी में अनुसूचित जनजातियों का अनुपात लगभग 97% है। चांगपा जैसी चरवाहा जातियां सदियों से इन अत्यधिक ऊंचाई वाले चारागाहों का संरक्षण करती आई हैं, जिससे सीमाओं पर प्रत्यक्ष नागरिक निगरानी बनी रहती है।

यही कारण है कि स्थानीय संगठन संविधान के अनुच्छेद 244 और छठी अनुसूची के विस्तार की मांग कर रहे हैं। व्यावहारिक स्तर पर, छठी अनुसूची के तहत स्वायत्त जिला परिषदों को भूमि हस्तांतरण, स्थानीय जल प्रबंधन और पारंपरिक शासन प्रणालियों पर कानून बनाने का अधिकार मिलता है। इससे अनियंत्रित निर्माण कार्यों से होने वाले भू-क्षरण पर रोक लगाई जा सकती है।

"अनुच्छेद 244 के प्रावधान संवेदनशील जनजातीय क्षेत्रों के संरक्षण के लिए बनाए गए हैं, ताकि वे स्थानीय समुदाय अपने पारिस्थितिक तंत्र का प्रबंधन कर सकें जो देश की सामरिक सीमाएं भी हैं।"

— संवैधानिक शासन ढांचा, अनुच्छेद 244

भावी परिदृश्य

सीमा पर आधारभूत ढांचे का विस्तार तेज है। जोजिला और शिंकू ला जैसी हर मौसम में खुली रहने वाली सुरंगें सर्दियों की विलगता समाप्त कर रही हैं। इसके विपरीत, वैज्ञानिक चेतावनी देते हैं कि नाजुक शीत मरुस्थल में भारी निर्माण कार्यों से हिमनदों के पिघलने की गति बढ़ सकती है। आगे की राह में, सामरिक सड़क निर्माण और हिमनदी पारिस्थितिकी के बीच तालमेल बैठाना ही होगा। क्षेत्रीय संप्रभुता और पर्यावरण संरक्षण एक-दूसरे के पूरक हैं।

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