भारत में समाज कल्याण योजनाएं: राजकोषीय सुधार और अर्थशास्त्र
परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण विषय एवं अवधारणाएं
- प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) एवं राजकोषीय ढांचा: लाभार्थियों के खातों में सीधे वित्तीय सहायता भेजकर रिसाव रोकने की व्यवस्था; लोक वित्त का केंद्रीय विषय।
- समावेशन बनाम अपवर्जन की त्रुटियां: सामाजिक न्याय के समक्ष दोहरी चुनौती—अपात्रों को लाभ मिलना (Inclusion Error) और वास्तविक जरूरतमंदों का बाहर छूटना (Exclusion Error)।
- केंद्र प्रायोजित योजनाएं बनाम केंद्रीय क्षेत्र की योजनाएं: संविधान के अनुच्छेद 275 और 282 के तहत केंद्र और राज्यों के बीच लागत-साझाकरण का ढांचा।
कल की मुख्य घटना
19 अक्टूबर 2026 को केंद्र सरकार ने भारत के सामाजिक कल्याण ढांचे में व्यापक वैधानिक अपडेट और नियामक दिशानिर्देश अधिसूचित किए। इनका मुख्य उद्देश्य लाभार्थियों के सत्यापन को मानकीकृत करना, राज्य-स्तरीय सामाजिक रजिस्ट्रियों का एकीकरण करना और समष्टि अर्थशास्त्र के स्तर पर सरकारी खर्चों में राजकोषीय पारदर्शिता को मजबूत करना है।
प्रशासनिक गलियारे और बजटीय रिसाव
सरकारी धन का सही उपयोग आवश्यक है। प्रशासनिक जटिलता अक्सर बजटीय आवंटन को सोख लेती है।
संसद जब ग्रामीण राहत के लिए ₹1,000 करोड़ स्वीकृत करती है, तब वह राशि तुरंत अंतिम नागरिक तक नहीं पहुँचती। वास्तव में, धन वितरण की गति और शुद्धता पर ही योजना का वास्तविक आर्थिक प्रभाव निर्भर करता है।
कल्याणकारी व्यय का समष्टि अर्थशास्त्र
सामाजिक कल्याण व्यय केवल राहत नहीं है। यह समष्टि आर्थिक संतुलन का एक सक्रिय माध्यम है।
जब किसी निम्न-आय परिवार को रियायती अनाज या रोजगार गारंटी के माध्यम से वित्तीय मदद मिलती है, तो उनकी उपभोग की सीमांत प्रवृत्ति (Marginal Propensity to Consume) लगभग 100% होती है। उच्च-आय वर्ग अतिरिक्त आय की बचत करता है; इसके विपरीत, एक दिहाड़ी मजदूर को मिला प्रत्येक रुपया तुरंत अनाज, दवा, बच्चों की शिक्षा या स्थानीय परिवहन पर खर्च हो जाता है। यह राशि स्थानीय बाजार में घूमकर मांग गुणक (Demand Multiplier) का निर्माण करती है, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था में तरलता बनी रहती है।
राजकोषीय आवंटन → प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) → तत्काल उपभोग (उच्च MPC) → स्थानीय बाजार में तरलता → व्यापक आर्थिक मांग
ढांचागत कमियों का निदान
19 अक्टूबर 2026 के नए दिशानिर्देश क्यों आवश्यक थे?
शहर की जलापूर्ति व्यवस्था से इसकी तुलना कीजिए। यदि मुख्य जलाशय से 10,000 लीटर पानी छोड़ा जाए और जर्जर पाइपों से 3,000 लीटर रिसाव में चला जाए तथा 2,000 लीटर अवैध कनेक्शनों में बह जाए, तो अंतिम छोर पर बैठा नागरिक प्यासा ही रहेगा। ऐतिहासिक रूप से, भारत की कल्याणकारी प्रणाली इन्हीं दो मुख्य चुनौतियों से जूझ रही थी:
- बिचौलियों द्वारा हेरफेर: बहुस्तरीय प्रशासनिक प्रक्रियाओं के कारण लेन-देन में घर्षण और संसाधनों का विचलन होता था।
- डेटाबेस का बिखराव: केंद्र और राज्यों की सूचियों में तालमेल न होने से फर्जी खाते बने रहे, जबकि प्रवासी परिवार पहचान के अभाव में वंचित रह गए।
नवीनतम वैधानिक आदेश इन कमियों पर सीधा प्रहार करते हैं। स्वचालित पहचान मिलान और समयबद्ध डेटा सत्यापन से फर्जी दावों को हटाया जाएगा। इससे राज्य के राजस्व की सुरक्षा होगी और पात्र नागरिकों को तकनीकी गड़बड़ियों के कारण लाभ से वंचित नहीं होना पड़ेगा।
आगे का रास्ता
- राज्य-स्तरीय समन्वय: राज्य सरकारों को अगले 180 दिनों में अपने स्थानीय डेटाबेस को नए केंद्रीय मानकों के अनुकूल बनाना होगा।
- धरातलीय सामाजिक अंकेक्षण: जिला प्रशासन को जमीनी स्तर पर सत्यापन अभियान चलाने होंगे, ताकि तकनीक के कारण दूर-दराज के क्षेत्रों में अपवर्जन की त्रुटि न बढ़े।
- बजटीय पुनर्मूल्यांकन: फर्जी खातों के निरसन से होने वाली राजकोषीय बचत से वित्त मंत्रालय प्राथमिक स्वास्थ्य और कृषि क्षेत्र के लिए अतिरिक्त बजटीय गुंजाइश निर्मित करेगा।