🎯 Question #173Environmental Issues & Conventions 📅 24 October 2026

हाइड्रोफ्लोरोकार्बन (HFC) के वैश्विक शासन के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल का किगाली संशोधन तीन दशकों में HFC की खपत में 80% कमी लाने का कानूनी रूप से आदेश देता है। 2. हाइड्रोफ्लोरोकार्बन प्रतिक्रियाशील क्लोरीन परमाणु जारी करके क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFC) की तरह ही समताप मंडलीय ओजोन परत को क्षीण करते हैं। ऊपर दिए गए कथनों में से कौन सा/से सही है/हैं?

Select an option above, then submit
Context Analysis

📖 In-Depth Fact-Check & Editorial Background

Read Article View →

This question was curated from today's in-depth analytical breakdown: किगाली लक्ष्यों के लिए भारत ने HFC विस्तार पर लगाई रोक

शीतलन का विरोधाभास: किगाली लक्ष्यों को पाने के लिए भारत ने HFC विस्तार पर क्यों लगाई रोक?

परीक्षाओं हेतु मुख्य विषय एवं अवधारणाएं

  • मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल का किगाली संशोधन (2016): यह एक कानूनी रूप से बाध्यकारी अंतर्राष्ट्रीय समझौता है, जिसका उद्देश्य आगामी 30 वर्षों में हाइड्रोफ्लोरोकार्बन (HFCs) के उपयोग में 80% से अधिक की कटौती करना है। परीक्षा दृष्टि: यह ओजोन-सुरक्षित किंतु उच्च उष्मीय प्रभाव वाली गैसों के नियमन का ढांचा है।
  • हाइड्रोफ्लोरोकार्बन (HFCs) और ग्लोबल वार्मिंग पोटेंशियल (GWP): ये कूलिंग उपकरणों में उपयोग किए जाने वाले सिंथेटिक रसायन हैं। ये ओजोन परत को नुकसान नहीं पहुँचाते, लेकिन वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड की तुलना में 14,800 गुना अधिक गर्मी सोखते हैं। परीक्षा दृष्टि: वैधानिक नियमन की शक्ति 'पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986' से प्राप्त होती है।
  • भारतीय संविधान का अनुच्छेद 48A: यह राज्य के नीति निर्देशक तत्वों का हिस्सा है, जो राज्य को पर्यावरण की रक्षा और सुधार करने का निर्देश देता है। परीक्षा दृष्टि: राष्ट्रीय पर्यावरण अधिसूचनाओं का संवैधानिक आधार।

हालिया घटनाक्रम

अप्रैल 2026 में, पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) ने भारत के किगाली संशोधन के तहत तय कटौती रोडमैप को लागू करने के लिए नई हाइड्रोफ्लोरोकार्बन (HFC) निर्माण इकाइयों की पर्यावरणीय मंजूरी पर पूरी तरह से रोक लगा दी।

शीतलन का विरोधाभास

वर्ष 1987 में वैश्विक समुदाय ने पर्यावरण रक्षा के लिए अभूतपूर्व सर्वसम्मति दिखाई। क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFCs) को समाप्त करने के लिए मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल स्वीकार किया गया, क्योंकि यह रसायन पृथ्वी की ओजोन परत को गंभीर क्षति पहुँचा रहा था। वैज्ञानिकों ने सीएफसी के विकल्प के रूप में हाइड्रोफ्लोरोकार्बन (HFCs) को प्रस्तुत किया। एयर कंडीशनर चलने लगे, रेफ्रिजरेटर में सामग्री सुरक्षित रहने लगी और ओजोन परत में धीरे-धीरे सुधार होने लगा।

परंतु इस सफलता के पीछे एक नया संकट छिपा था। यद्यपि HFCs ओजोन को नुकसान नहीं पहुँचाते, लेकिन वे वायुमंडल में उष्मीय चादर की तरह काम करते हैं। महज 1 किलोग्राम HFC वायुमंडल में उतनी ही गर्मी रोकता है, जितनी 14,800 किलोग्राम कार्बन डाइऑक्साइड। इस प्रकार, ओजोन संकट को हल करने के प्रयास में अनजाने में जलवायु असंतुलन गहरा गया।

वैधानिक और रणनीतिक घटनाक्रम

भारत की शीतलन नीति एक स्पष्ट कानूनी तंत्र पर आधारित है:

  • 23 मई, 1986 — वैधानिक आधार: भारत ने 'पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986' लागू किया, जिसने औद्योगिक उत्सर्जन और खतरनाक रसायनों को नियंत्रित करने का मुख्य legal ढांचा तैयार किया।
  • 15 अक्टूबर, 2016 — किगाली समझौता: रवांडा में मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल के पक्षकारों की 28वीं बैठक में HFCs को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने का अंतर्राष्ट्रीय जनादेश तय किया गया।
  • 8 मार्च, 2019 — इंडिया कूलिंग एक्शन प्लान (ICAP): भारत व्यापक शीतलन रणनीति पेश करने वाला पहला देश बना, जिसका लक्ष्य 2037–38 तक कूलिंग ऊर्जा मांग में 25% की कमी लाना है।
  • 18 अगस्त, 2021 — औपचारिक अनुसमर्थन: भारत ने संविधान के अनुच्छेद 48A के तहत पर्यावरण संरक्षण के संकल्प के साथ किगाली संशोधन का औपचारिक अनुसमर्थन किया।
  • अप्रैल 2026 — उत्पादन पर रोक: MoEFCC ने भविष्य में उच्च-GWP वाले रसायनों के उत्पादन को रोकने के लिए नए HFC संयंत्रों की पर्यावरणीय मंजूरी पर रोक लगाई।

मूल अवधारणाओं का विश्लेषण

1. ग्लोबल वार्मिंग पोटेंशियल (GWP)

ग्लोबल वार्मिंग पोटेंशियल पृथ्वी के चारों ओर गर्मी रोकने वाली गैसों की क्षमता को मापता है। कार्बन डाइऑक्साइड ($CO_2$) को baseline मानकर इसका मूल्य 1 तय किया गया है। वहीं 14,800 GWP वाली गैस का अर्थ है कि वह वातावरण में $CO_2$ से 14,800 गुना अधिक ऊष्मा रोकती है। वास्तव में, कारखानों या शीतलन उपकरणों से होने वाला थोड़ा सा HFC रिसाव भी भयंकर गर्मी पैदा करता है।

2. औद्योगिक 'कार्बन लॉक-इन'

यदि कोई कंपनी आज रासायनिक संयंत्र स्थापित करने में ₹500 करोड़ का निवेश करती है, तो लागत वसूलने के लिए उसे 25 से 30 वर्षों तक संयंत्र चलाना पड़ता है। यदि 2026 में नए HFC कारखानों को मंजूरी दी जाती, तो भारत अगले कई दशकों के लिए उच्च-उत्सर्जन चक्र में फंस जाता। मंजूरी रोकने से उद्योग अब अपना पूंजीगत निवेश केवल पर्यावरण-अनुकूल विकल्पों जैसे hydrofluoroolefins (HFOs), प्रोपेन और अमोनिया में लगाने के लिए बाध्य होंगे।

भविष्य की राह

अप्रैल 2026 में नए HFC संयंत्रों की मंजूरी बंद करके भारत ने अपने औद्योगिक क्षेत्र को निष्क्रय संपत्तियों में फंसने से बचा लिया है। भविष्य की दृष्टि से यह कदम किगाली रोडमैप के पूरी तरह अनुकूल है:


[2026] नई पूंजीगत मंजूरी पर रोक 
   └───► [2032] बेसलाइन फ्रीज और प्रथम चरण की कटौती
           └───► [2037] द्वितीय चरण की कटौती
                   └───► [2042] तृतीय चरण की कटौती
                           └───► [2047] अंतिम लक्ष्य: 85% की कुल कमी

वर्ष 2032 से शुरू होकर भारत एक चार-चरणीय कटौती समयरेखा को लागू करेगा, जिससे 2047 तक राष्ट्रीय HFC उत्पादन और खपत में 85% की संचयी कमी हासिल होगी। पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के वैधानिक अधिकारों और अनुच्छेद 48A के संवैधानिक मार्गदर्शन में भारत यह सिद्ध कर रहा है कि आर्थिक प्रगति और पर्यावरण संरक्षण एक साथ चल सकते हैं।

Practice More Quizzes

Sharpen your accuracy with hundreds of curated daily MCQs.

← All Practice Questions
An unhandled error has occurred. Reload 🗙

Rejoining the server...

Rejoin failed... trying again in seconds.

Failed to rejoin.
Please retry or reload the page.

The session has been paused by the server.

Failed to resume the session.
Please retry or reload the page.