समान नागरिक संहिता: एकरूपता और व्यक्तिगत अधिकारों का द्वंद्व
परीक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण बिंदु
- अनुच्छेद 44 (DPSP): पूरे भारत में समान नागरिक संहिता लागू करने का राज्य का संवैधानिक प्रयास।
- मूल अधिकार (अनुच्छेद 14, 15, 21): समानता, गैर-भेदभाव और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की गारंटी।
- नवतेज सिंह जौहर बनाम भारत संघ (2018): सहमति से बने समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर करने वाला ऐतिहासिक निर्णय।
25 अक्टूबर, 2026 को UCC पर चल रही विधायी चर्चाओं ने एक नया आयाम पकड़ा है। अब बहस केवल विभिन्न धार्मिक कानूनों के एकीकरण तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें समलैंगिक जोड़ों और ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की कानूनी स्थिति को स्पष्ट रूप से शामिल किया गया है। यह बदलाव पारंपरिक बाइनरी फ्रेमवर्क को चुनौती दे रहा है।
यदि संविधान का लक्ष्य प्रत्येक नागरिक की स्वतंत्रता की रक्षा करना है, तो समान नागरिक संहिता क्या अनजाने में हमारे सबसे संवेदनशील वर्गों को हाशिये पर धकेल सकती है? यह आज का सबसे बड़ा संवैधानिक प्रश्न है।
दशकों से भारत में विवाह, तलाक और विरासत के नियम अलग-अलग निजी कानूनों से चलते रहे हैं। अनुच्छेद 44 का उद्देश्य एक साझा कानून बनाना है। लेकिन, आज यह प्रक्रिया एक संवैधानिक तनाव परीक्षण से गुजर रही है। 2018 के नवतेज सिंह जौहर फैसले ने अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्ति को अपनी पसंद के साथ गरिमापूर्ण जीवन जीने का अधिकार दिया है।
अब चुनौती यह है कि एक ऐसा समान कानून कैसे बनाया जाए जो परंपराओं का सम्मान भी करे और आधुनिक पहचानों को भी स्वीकार करे? यदि UCC केवल स्त्री-पुरुष के पारंपरिक ढांचे पर आधारित रहा, तो यह अनुच्छेद 14 और 15 के तहत मिलने वाली समानता के अधिकार का उल्लंघन कर सकता है।
शब्दकोश
- नीति निदेशक तत्व (DPSP)
- संविधान की वह इच्छा सूची जिन्हें राज्य को लागू करने का प्रयास करना चाहिए।
- निजी कानून (Personal Laws)
- विवाह और संपत्ति जैसे मामलों में धर्म आधारित नियम।
- बाइनरी फ्रेमवर्क
- कानून की वह पुरानी सोच जो समाज को केवल दो श्रेणियों—पुरुष और महिला—में बांटती है।
आगे की राह
- विधायी ड्राफ्टिंग: संसद को पति-पत्नी या परिवार जैसे शब्दों को जेंडर-न्यूट्रल तरीके से परिभाषित करना होगा।
- न्यायिक समीक्षा: यह तय है कि UCC के प्रावधानों को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी जाएगी।
- सार्वजनिक संवाद: सरकार को अब LGBTQIA+ समूहों के साथ औपचारिक चर्चा करनी होगी ताकि कानून किसी को भी बाहर न छोड़े।