अधिकार और नीति निर्देशक तत्व: समान नागरिक संहिता के जरिए संवैधानिक संतुलन
तात्कालिक संदर्भ: 24 अक्टूबर 2026 को गुजरात विधानसभा ने समान नागरिक संहिता विधेयक पारित किया, जिसके तहत विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और सहवास के लिए संहिताबद्ध नियम तय कर अनुच्छेद 44 को क्रियान्वित किया गया है।
संवैधानिक संतुलन: अधिकार और नीति निर्देश
मूल अधिकार नागरिक सुरक्षा देते हैं। नीति निर्देशक तत्व सामाजिक लक्ष्य तय करते हैं।
सात दशकों तक अनुच्छेद 44 महज सैद्धांतिक विमर्श तक सीमित रहा। भारतीय संविधान वस्तुतः दोहरी व्यवस्था पर टिका है: भाग III नागरिकों को तुरंत वादयोग्य अधिकार सौंपता है; भाग IV विधायिका को लोककल्याणकारी शासन का निर्देश देता है। जब अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता के दावे अनुच्छेद 14 की समानता से टकराते हैं, तब संवैधानिक असमंजस खड़ा होता है।
गुजरात का नया कानून इस परिदृश्य को पुनर्गठित करता है। समवर्ती सूची की प्रविष्टि 5 का सहारा लेकर राज्य ने विभिन्न संप्रदायों के व्यक्तिगत कानूनों के स्थान पर एक समान नागरिक ढांचा खड़ा किया है।
वैधानिक तुलनात्मक स्थिति
| मानक | पूर्व स्थिति | नवीन वैधानिक व्यवस्था | धरातलीय प्रभाव |
|---|---|---|---|
| नागरिक कानून व्यवस्था | अलग-अलग संप्रदायों के पृथक व्यक्तिगत नियम और असमान प्रक्रियाएं। | समवर्ती सूची की प्रविष्टि 5 और अनुच्छेद 44 के तहत संहिताबद्ध कानून। | राज्य भर में नागरिक मुकदमों के लिए एकीकृत विधिक ढांचा। |
| उत्तराधिकार का अधिकार | रूढ़िवादी परंपराएं, जिनमें बेटियों के संपत्ति अधिकारों पर सीमाएं थीं। | अनुच्छेद 14 और 15 के अनुरूप पुत्र और पुत्री को समान दायित्व व अधिकार। | पैतृक संपत्तियों में पुत्रियों को बराबरी का कानूनी संरक्षण। |
| लिव-इन संबंध | विशिष्ट संहिताबद्ध सुरक्षा के अभाव में अदालती फैसलों पर निर्भरता। | अनिवार्य प्रशासनिक पंजीकरण और भरण-पोषण की वैधानिक गारंटी। | साझेदारों को कानूनी सुरक्षा और बच्चों को पूर्ण पैतृक अधिकार। |
| अनुच्छेद 44 की स्थिति | वर्ष 1950 से अनुच्छेद 37 के अधीन गैर-प्रवर्तनीय संवैधानिक अपेक्षा। | अनुच्छेद 254(2) के तहत राष्ट्रपति की सहमति की ओर अग्रसर राज्य अधिनियम। | आकांक्षात्मक निर्देश का बाध्यकारी कानून में रूपांतरण। |
हितधारकों पर वास्तविक प्रभाव
संवैधानिक प्रावधानों की परीक्षा उनके प्रशासनिक क्रियान्वयन में होती है।
- महिलाएं: विवाह विच्छेद, गुजारा भत्ता और पैतृक उत्तराधिकार में निष्पक्ष कानूनी अधिकार प्राप्त करती हैं।
- अधीनस्थ न्यायपालिका: मुकदमों का निस्तारण जटिल धार्मिक नियमों के बजाय स्पष्ट संहिताबद्ध धाराओं के आधार पर करती है।
- लिव-इन साझेदार: औपचारिक पंजीकरण से कानूनी अधिकार पाते हैं, यद्यपि अनिवार्य सूचना प्रक्रिया अनुच्छेद 21 के तहत निजता के सवाल भी खड़े करती है।
- संघ और राज्य सरकारें: अनुच्छेद 254(2) की जटिलताओं को सुलझाते हुए विधायी स्वायत्तता की सीमाओं का परीक्षण करती हैं।
संवैधानिक परिदृश्य
ऐतिहासिक रूप से, शाह बानो (1985) और सरला मुद्गल (1995) मामलों में सर्वोच्च न्यायालय ने रेखांकित किया था कि व्यक्तिगत कानूनों को संवैधानिक समानता के अनुरूप ढाला जाना आवश्यक है।
धरातल पर, संघवाद नए प्रयोगों के लिए उपयुक्त मंच प्रस्तुत करता है। जब राज्य समवर्ती सूची का प्रयोग कर नीति निर्देशक तत्वों को लागू करते हैं, तब वे राष्ट्रीय स्तर के लिए व्यावहारिक प्रारूप तैयार करते हैं। वस्तुतः, यह घटनाक्रम प्रमाणित करता है कि अनुच्छेद 37 निष्क्रिय नहीं है; बल्कि यह नीति निर्माण का ठोस आधार है। आगे चलकर, न्यायिक समीक्षा यह तय करेगी कि राज्य स्तर का यह कानून भाग III में दिए गए मूल अधिकारों की रक्षा करते हुए किस सीमा तक नागरिक समानता सुनिश्चित करता है।